एक अरसे के बाद देश की सबसे पुरानी और अभी मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस ने एक ऐसा कदम उठाया है, जिससे देश की राजनीति को नयी दिशा मिल सकती है। साथ ही जनाधार हासिल करने के संकट से गुजर रही कांग्रेस के लिए यह संजीवनी साबित हो सकता है। 7 सितम्बर से कन्याकुमारी से राहुल गांधी के नेतृत्व में भारत जोड़ो यात्रा की शुरुआत हुई है। यात्रा शुरु करने से पहले राहुल गांधी तमिलनाडु के श्रीपेरम्बुदूर में अपने दिवंगत पिता राजीव गांधी के स्मृति स्थल पहुंचे और वहां उन्हें श्रद्धांजलि दी। इस मौके पर राहुल गांधी ने एक भावुक ट्वीट किया, उन्होंने लिखा- 'नफरत और बंटवारे की राजनीति में मैंने अपने पिता को खो दिया।
मैं अपने प्यारे देश को भी इसमें नहीं खोऊंगा। प्यार नफरत को जीत लेगा। आशा डर को हरा देगी। हम सब मिलकर मात देंगे।' उनके इस ट्वीट से जाहिर होता है कि यह यात्रा उनके लिए केवल राजनैतिक ही नहीं व्यक्तिगत तौर पर भी काफी मायने रखती है। गांधी परिवार से कोई वैचारिक तौर पर सहमत हो या न हो, लेकिन इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि इस परिवार में पहले इंदिरा गांधी और उनके बाद राजीव गांधी की हत्याएं नफरती और विभाजनकारी राजनीति का ही परिणाम हैं। राहुल गांधी जब से राजनीति में सक्रिय हुए हैं, उन्होंने लगातार इस नफरत की मुखालफत की है। पाठकों को याद होगा कि 2018 की जुलाई में लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव के दौरान अपने भाषण के बाद राहुल गांधी ने सदन में बैठे प्रधानमंत्री मोदी को गले लगा लिया था।
श्री मोदी को गले लगाने से पहले राहुल ने कहा था, 'आपके भीतर मेरे लिए नफ़रत है। गुस्सा है। मगर मेरे अंदर आपके प्रति इतना सा भी गुस्सा, इतना सा भी क्रोध, इतनी सी भी नफ़रत नहीं है।' तब इस घटना को लेकर सोशल मीडिया पर राहुल गांधी की आदतन आलोचना की गई थी। किसी ने उन्हें अपरिपक्व बताया। किसी ने दुश्मन को गले लगा कर हराने की तरकीब करार दिया। हालांकि लगातार ट्रोलिंग का शिकार राहुल गांधी ने इस आलोचना को भी सम्यक भाव से ही ग्रहण किया। एक साल बाद तमिलनाडु में जब एक छात्रा ने उनसे इस बारे में सवाल किया था, तब भी राहुल गांधी ने कहा था कि संसद में मोदीजी उनकी पार्टी कांग्रेस, उनकी मां सोनिया गांधी और दिवंगत पिता राजीव गांधी के बारे में बोलते हुए काफी गुस्से में दिख रहे थे तो उन्हें लगा कि मोदीजी दुनिया की सुंदरता को नहीं देख पा रहे हैं। इसलिए मुझे लगा कि कम से कम मेरी ओर से उनके प्रति स्नेह दिखाया जाना चाहिए। राहुल गांधी का यह जवाब किसी दार्शनिक की तरह प्रतीत होता है, जो आंख के बदले आंख वाली राजनीति में फिट नहीं बैठता। लेकिन हकीकत यही है कि भारत ही नहीं दुनिया को आज प्यार के ऐसे ही दर्शन की जरूरत है।
संसद में मोदीजी को गले लगाने के 4 साल बाद अब राहुल गांधी पूरे भारत को नफरत के खिलाफ एकजुट करने निकल पड़े हैं। इन चार सालों में कांग्रेस जनाधार के लिहाज से कुछ और कमजोर हुई है, जबकि भाजपा की सत्ता का दायरा कुछ और बढ़ गया है। इन चार सालों में देश में सांप्रदायिकता और धर्मांधता के फसाद भी बढ़े हैं। हिजाब, हलाल मीट, नमाज़, मदरसों की शिक्षा सब पर रोज नए-नए विवाद सामने आते हैं। जिहाद के साथ कई किस्म के शब्दयुग्म बन चुके हैं। लव जिहाद, शिक्षा जिहाद, भोजन जिहाद, आर्थिक जिहाद जैसी कई किस्में राजनीति के बाज़ार में लाई जा चुकी हैं और इनके दम पर नफरत के कारोबार को बढ़ाया जा रहा है।
सदियों से हिंदुस्तान में अलग-अलग धर्मों के लोग एक साथ रह रहे थे और उनके बीच लड़ाई-झगड़े होने के बावजूद परस्पर अविश्वास इस तरह कभी कायम नहीं हुआ था। लेकिन अब समाज के भीतर संदेह और अविश्वास की खाई बहुत गहरी हो चुकी है, जिसका असर सामान्य जनजीवन में भी नजर आने लगा है। खान-पान, पहनावे और पूजा पद्धति से लेकर विचारधारा तक असहिष्णुता बढ़ने लगी है। सोशल मीडिया पर रोजाना ऐसी घटनाएं देखी जा सकती हैं, जहां धर्म, जाति, क्षेत्र या लिंग के भेद के कारण कमजोरों पर हिंसा हो रही है। ये हालात न देश के लिए वर्तमान के लिए ठीक हैं, न भविष्य के लिए।
इस कठिन वक्त में कांग्रेस ने भारत जोड़ो यात्रा निकालने का फैसला लेकर एक सराहनीय काम किया है। कन्याकुमारी से श्रीनगर तक 37 सौ किमी की इस यात्रा के कई पड़ाव देश के अलग-अलग शहरों में होंगे। यात्रा का एक जत्था सुबह तीन घंटे पदयात्रा करेगा, दूसरा जत्था शाम को तीन घंटे पदयात्रा करेगा। इस दौरान समाज के विभिन्न लोगों से जीवंत संपर्क होगा, उनकी तकलीफों से रूबरू होने का मौका यात्रियों को मिलेगा। जिस तरह गांधीजी ने कांग्रेस को संभ्रांत और धनाढ्य बिरादरी से बाहर निकाल कर जनसामान्य के साथ जोड़ने का काम किया था। उम्मीद है कि राहुल गांधी के नेतृत्व में एक बार फिर कांग्रेस उसी तरह जनता से जुड़ेगी। अब अगले पांच महीने तक राहुल गांधी समेत तमाम यात्रियों का ठिकाना कंटेनरों में होगा, जो सोने और रोजमर्रा की सुविधाओं को ध्यान में रखते हुए तैयार किए गए हैं। अगले पांच महीनों में देश की प्रमुख समस्याओं जैसे महंगाई, बेरोजगारी, आर्थिक संकट और नफरत के माहौल को लेकर लोगों से जीवंत संवाद होगा और ये आवाज दिल्ली के गलियारों तक भी पहुंचेगी।
आगामी विधानसभा चुनाव और फिर आम चुनाव पर इस यात्रा का क्या असर हो सकता है, इसका आकलन पांच महीने बाद ही संभव हो पाएगा। फिलहाल भारत जोड़ो यात्रा के आगाज़ पर उत्साह का जो माहौल है, उसे देखकर अंजाम की कल्पना की जा सकती है। वैसे भाजपा की ओर से हिमंता बिस्वासरमा ने तंज भी कसा है कि कांग्रेस को भारत जोड़ो यात्रा भारत में नहीं बल्कि पाकिस्तान में शुरू करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि भारत पहले से जुड़ा और एकजुट है। ऐसे में कांग्रेस को पाकिस्तान में इस यात्रा का संचालन करना चाहिए। इस तरह की प्रतिक्रिया दर्शाती है कि राजनीति में नफरत कितनी हावी हो चुकी है और ऐसे में कांग्रेस की भारत जोड़ो यात्रा का महत्व और बढ़ जाता है।